Wednesday, December 16, 2009

आल्मोस्ट सिंगल



ये उस किताब का नाम है जो इन दिनों मैं पढ़ रही हूं, चेतन भगत की सारी किताबें खत्म करने के बाद इस बार कुछ नया ट्राय किया जाए के मूड में यह किताब उठा लाई। हजबैंड के साथ सीसीडी में उनके किसी मित्र से मिलने गई थी, तो मैंने सोचा दोनों दोस्त सालों बाद मिले हैं इन्हें कुछ गपियाने दो इन द मीन टाइम मैं बुक कैफे पर कुछ किताबें ही देख लेती हूं। बुक कैफे पर हिन्दी उपन्यास तो मिलते नहीं है नहीं तो नो डाउट मैं हिन्दी लवर हिन्दी का ही कोई उपन्यास पढ़ रही होती। लेकिन जो उपलब्ध था उसीमें देख रही थी। नाम कुछ सुना सा लग रहा था , आल्मोस्ट सिंगल। राइटर भी शायद काफी यंग ही हैं टवेंटी नाइन समथिंग अद्वेता काला।



देसी-विदेसी अखबारों की प्रशंसाओं के जो टुकड़े लगा रखे थे, उनसे तो यही लग रहा था कि राइटर का सेंस आफ ह्यूमर गजब है और वो चीजों को बहुत ओपनली कहने में यकीन करती हैं। खैर ये तो रही राइटर की बात , कहानी तीन सहेलियों की है, जिसमें नैरेटर खुद मुख्य पात्र है ये सब उम्र के उस दौर से गुजर रही हैं जब भारत में शादीशुदा न होना बहुत बड़ा अपराध है। नेचुरली यह सब सिंगल हैं और अपने परफेक्ट मैच के लिए पागल हो रही हैं। शादी की वेबसाइट्स से लेकर डिस्कोज में खोज जारी है पर दुनिया के जितने परफेक्ट और सेंसिबल मर्द हैं वो या तो पहले से शादीशुदा हैं या फिर गे हैं। (ये मेरी तरफ से)तो वे भी फिलहाल एक अच्छे मैच की खोज हैं, कैसे इन्हें अपना परफेक्ट मैच मिलता है और लाइफ के छोटी-छोटी घटनाओं को क्लब करके लिखी गई हैं। अद्वेता की शैली काफी विटी है(अंग्रेजी वाला विटी है यार) कहीं कहीं थोड़ी नाटी भी हो जाती हैं, कहीं कहीं कुछ ज्यादा ही डिटेल में भी चली जाती हैं(वैसे भी)किताब जनरली आपको बोर तो नहीं करती पर बेहद ला‍न्ग रीडिंग्स परेशान कर देती है और खासकर मेरे जैसे लोगों के लिए जिन्हें घंटों में और एक ही सीटिंग में किताबें पढ़ना पसंद है।


.......और इधर मेरे पतिदेव परेशान हैं तुम आल्मोस्ट सिंगल पढ़ने के चक्कर में मुझे कोई आल्मोस्ट सिंगल बना दे रही हो, मैं यहां अकेला बैठ कर टीवी देख रहा हूं और इन पकाऊ चैनल्स को झेल रहा हूं तुम वहां मुझे से आल्मोस्ट सिंगल पढ़ रही हो। :-)

Tuesday, December 8, 2009

‘उत्तर’ वे हैं, किन्तु प्रश्न हमसे पूछ रहे हैं

कल्पेश याग्निक
यह बड़ा छलावा है। जलवायु बिगाड़ने वाले मुट्ठी भर हैं। उनके शिकार असंख्य। हमारे देश को ही लें। हमें सबूतों सहित छठे क्रम का बुरा बना दिया गया है। यानी पांच ही देश हिंदुस्तान से ज्यादा खराब हैं। और दुनिया का वातावरण खराब कर रहे हैं। यही छलावा है। कैसे? इसे कोपनहेगन में इकट्ठे शासनाध्यक्षों की नहीं, हमारी अपनी भाषा में समझें।
ताकतवर ‘नॉर्थ’ की करतूत
हमें अमीर-गरीब में बांटने वाले तेज तर्रार लोग नॉर्थ यानी उत्तर में फले-फूले और पूरी दुनिया में फैल गए। खासकर उत्तरी अमेरिका और यूरोपीय देशों के ये रहवासी विश्व जनसंख्या का 20 फीसदी हैं। कुल सुविधाओं, साधनों, संसाधनों का 80 फीसदी उपभोग कर रहे हैं। कुल वातावरण को 70 फीसदी प्रदूषित कर रहे हैं। अब हमें और सारे देशों को कह रहे हैं- आप जलवायु परिवर्तन रोकिए। घातक कार्बन गैसों को उगलना कम कीजिए। 20 फीसदी लोग। 80 फीसदी उपभोग। 70 फीसदी प्रदूषण। बचे 80 फीसदी को कुचलने पर आमादा।

खतरा तो है, करना क्या होगा?
कार्बन खासतौर पर तीन तरह से निकलती है। ऊर्जा, तेल और प्राकृतिक गैस के चलने से। सीधी बात यह है कि हमारे देश में आम आदमी के रहन-सहन में खास बदलाव नहीं आएगा। चाहे कितना भी कम कर दें कार्बन उगलना। क्योंकि अभी सड़कें ही नहीं हैं देशभर में। तो आवाजाही बहुत कम है। बिजली है ही नहीं लाखों इलाकों में। इसलिए खपत का प्रश्न ही नहीं। कोई 8 से 18 करोड़ लोग या तो दो जून की रोटी के लिए संघर्षरत् हैं या बस घर चल जाता है। जो कुछ बदलना होगा - वो उद्योगों को। जबकि ताकतवर ‘नॉर्थ’ को अपने रहवासियों को महंगे ईधन खर्च कम करने वाली यात्राओं में कटौती को कहना होगा। लंबी, ऐशो आराम वाली छुट्टियां घटानी होंगी। विलासिता के जितने भी विकृत रूप हैं, आकार में लाने होंगे। और ऊर्जा के सारे दुरुपयोग कम करने होंगे। उद्योगों का तो पूछना ही क्या? अमेरिका तो कई बार वादे कर के पलट चुका है। रियो बैठक में कहा था 6 प्रतिशत कार्बन छोड़ना कम करेंगे। 15 प्रतिशत बढ़ा दिया। यूरोपीय यूनियन ने 8 प्रतिशत घटाने की बात की थी, 2 ही कर पाए। कोई खेद तक नहीं। भारत तो फिर भी सबसे तेज बढ़ती आर्थिक ताकत है, छोटे देशों की सोचें तो भयावह दबाव लगता है।

वहां के युवाओं की सोच उल्टी
जानना जरूरी है कि इन धनी, औद्योगिक देशों के युवा- जिन पर यह जिम्मेदारी आएगी- क्या सोचते हैं। ख्यात शैल कंपनी द्वारा पिछले साल 27 देशों के लाखों युवाओं पर कराए गए सर्वे में साफ आया है कि अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी और इटली के युवा अपनी जीवनशैली बदलने को तैयार नहीं। उन्हें ‘बड़े बंगले’ और ‘महंगे उपकरणों’ वाली सुविधाएं ही चाहिए। क्लाइमेट चेंज से उन्हें ज्यादा लेना-देना नहीं।

...तो हल क्या है?
जलवायु परिवर्तन के लिए कुछ करने का समय आज ही है। कोपनहेगन सम्मेलन इसके लिए आकाश-पाताल हो रहा है। किन्तु जमीनी हकीकत से हटकर। हकीकत यही है कि इन धनी देशों को टेक्नोलॉजी बांटनी होगी। बातों-भाषणों-उपदेशों से हटकर सिर्फ टेक्नोलॉजी ही इसका एकमात्र उपाय है। यानी कोयला जलना कम नहीं हो सकता तो क्योंकि बिजली जलना जरूरी है- तो उसे फ्री-हीट करने, उसका कार्बन उड़ने से रोकने की टेक्नोलॉजी पर हो रहे काम को फंड करना होगा। जमीन के नीचे की गर्मी के उपयोग की टेक्नोलॉजी पर खर्च करना होगा। न्यूक्लियर ऊर्जा का सदुपयोग करना होगा। हमारा देश तो थोरियम-आधारित साफ-सुथरी टेक्नोलॉजी का जिम्मा लेने का दम रखता है। समुद्री ऊर्जा और सौर ऊर्जा पर पैसे लगाने होंगे। 700 बिलियन डॉलर कुछ कंपनियों को बचाने के लिए दिए जा सकते हैं- तो जीवन के लिए क्या 7 बिलियन भी नहीं। निर्लज्ज ‘उत्तर’ से यही प्रश्न है।
(कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर हैं)

Thursday, November 19, 2009

स्पेयरिंग फ्यू मोमेंट्स फा‍र चेतन भगत


यूं तो पढ़ने को बहुत ज्यादा टाइम इन दिनों नहीं मिलता , फिर भी चेतन भगत की दो किताबें थीं जो मैं काफी समय से पढ़ना चाह रही थी तो इस बार दिल्ली जाना हुआ तो मैंने सोचा क्यों न रास्ते में दोनों किताबें पढ ली जाएं। तो पहले छूटी हुई किताब वन नाइट एट काल सेंटर का नंबर लगा वो इसलिए भी की क्योंकि लेखक ने भी टू स्टेट्स से पहले यह किताब लिखी है।(टू स्टेट्स अभी रिसंटली पब्लिश हुई है) वन नाइट एट का‍ल सेंटर कहानी है छह लोगों की जो एक काल सेंटर के एक ही सेक्शन में साथ काम करते हैं, और सभी की जिन्दगी सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। ऐसे में वे एक ड्राइव पर जाते हैं औऱ उनकी गाड़ी एक बन रही बिल्डिंग के गड्ढे में फंस जाती है , सबको लगता है मौत आने ही वाली है पर तभी एक फोन बजता है जो भगवान का है ( ओ माय गा‍ड मैं कम से कम चेतन भगत से यह एक्सपेक्ट नहीं कर रही थी) मैं नावेल पढ़ रही थी औऱ मुझे लगा रहा था कि मैं किसी बालीवुड फिल्म की स्टोरी सुन रही हूं। खैर जैसा भी हो भगवान उन सब को कुछ राय देते हैं और उनकी लाइफ वापस ट्रेक पर आ जाती है। भगवान में यकीन करने वाले लोगों के लिए यह स्टोरी गजब है, पर मुझे बिलकुल मजा नहीं आया। इसकी बजाय मुझे टू स्टेट्स थोड़ी ठीक लग रही है, जिसका पढ़ना फिलहाल जारी है. पर इन दिनों समयाभव के कारण उसके अंतिम कुछ पन्ने बचे हैं जिस दिन पढ़ती हूं उस दिन उसके बारे में लिखूंगी।
..और हां पता नहीं क्यों चेतन भगत की हर किताब में नायक खुद को लूजर लूजर बताता अंत में सब कुछ पा जाता है मन पसंद लड़की, मां बाप का साथ औऱ ढेर सा पैसा गजब है न। तभी तो बालीवुड डायरेक्टर्स उसकी कहानियां फिल्में बनाने के लिए रेजिज्ट नहीं कर पाते। हालांकि वन नाइट एट काल सेंटर पर बनी मूवी हैलो या ऐसा ही कुछ नाम था, डिजाजस्टर थी. बाप रे आप अमृता अरोड़ा और सुहेल टाइप लोगों को कैसे झेल सकते हैं। शायद अतुल अग्निहोत्री ने बनाई थी तो ऐसी ही होनी थी।
चेतन की स्टोरी पर बेस्ड एक और मूवी आने वाली है थ्री इडियट्स जो उनकी पहली किताब फाइव पाइंट्स समवन पर लिखी है जो आज भी मुझे उनकी बेहतरीन किताब लगती है। दिल से और पूरी इमानदारी से लिखी गई किताब है जहां लगता है कि नायक वाकई लूजर है :-)

Thursday, November 12, 2009

ओल्ड हैबिट्स डाय हार्ड




अकसर जिन दिनों में ब्लाग पर काफी विजिट कर रही होती हूं, उन दिनों सोचती हूं अब रेगुलर लिखूंगी लेकिन फिर वही होता है व्यस्तताएं आती हैं और ब्लाग पर लिखना बहुत कम हो जाता है. सिर्फ लिखना ही नहीं दूसरे ब्लाग पढना तो और भी कम हो जाता है। मेरे फेवरेट ब्लाग जिन्हें अगर मैं नेट पर रहूं तो पढ़े बिना रह ही नहीं सकती. पर इन दिनों काम का प्रेशर इतना जबरदस्त है कि ब्लाग लिखना संभव ही नहीं हो पा रहा है। खैर मैं जानती हूं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और जो लोग आपको रेगुलर पढते हैं और आपसे कम्यूनिकेट करते हैं, उन्हें इसकी आदत हो जाती है। खैर, ये कोई कारण नहीं है और बहाना भी नहीं पर कुछ आदते हैं जो मरने के साथ ही छूटती हैं और मुझे लगता है कि ब्लागिंग इनमें शुमार होने जा रही है.
वैसे भी वो कहते हैं न अंग्रेजी में ओल्ड हैबिट्स डाय हार्ड ये भी वैसी ही आदत हो चुकी है। लेकिन पता नहीं समयहो न हो कुछ मिनट चुरा कर कुछ लाइनें तो लिखी ही जा सकती है जैसा आज कर रही हूं। क्योंकि बहुत दिन की चुप्पी बहुत सी गलतफहमियां पैदा कर देती हैं, ऐसे मेरे एक मित्र कहते हैं। तो उनकी बात पर अमल करते हुए ये चुप्पी तोड़ ही देती हूं। आप सब से बहुत माफी चाहती हूं और कोशिश करूंगी कि थोड़ा सा लिखने का रूटीन बना कर रखूंगी और अगली बार ये जरूर बताऊंगी कि इन दिनों क्या पढ़ा और उसका क्या असर रहा।
लेकिन अपने ब्लाग से भी ज्यादा दुख उन कम्यूनिटी ब्लाग्स के लिए होता है जिनसे न जाने कब से जुड़ी हूं पर कभी लिखती ही नहीं हू। चाहती हूं तब भी नहीं लिख पाती, वही कब वक्त का बहाना तो कभी विषय का।

(चित्र फ्लिकर से साभार )

Saturday, October 31, 2009

नाकारा नेता और भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसी


जयपुर की आग ने जहां इतनी बड़ी कंपनी के सुरक्शा दावों की पोल खोल कर रख दी है साथ ही हमारे नाकारा नेताओं और भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसी की सच्चाई भी सबके सामने ला दी है।
आखिर कैसे लाखों लीटर तेल घनी आबादी एरिया में रखने की इजाजत दे दी । अगर यह जगह आयल डिपो को पहले आवंटित की गई थी तो वहां कैसे इंडस्ट्रियल एरिया और रिहायशी एरिया डवलप होने दिया गया।
आयल डिपो में लाखों लीटर तेल था तो उसे बुझाने के इंतजाम क्यों नहीं थे?
सरकारों के सामने ऐसे हजारों प्रश्न है लेकिन हमारे सरकारें उनकी तो कुंभकर्णी नींद ही टूटने का नाम नहीं ले रही। केवल बयान जारी करने के अलावा वे कुछ नहीं कर सकते। ज्यादा हो तो फोटोग्राफरों को और कैमरामैनों को साथ ले जाकर अस्पताल में भर्ती लोगों का हालचाल पूछ लीजिए। हो गई कर्तव्य की इतिश्री।
पेट्रोलियम मंत्री आते हैं औऱ बयान देते हैं जब इन टैंकों का तेल खत्म होगा तभी आग बुझेगी। आखिर आप इतना बड़ा पेट्रोलियम मंत्रालय चलाते हैं जहां ये भी नहीं पता कि इन बड़े बड़े टैंकों में अगर लाग जाए तो उसे बुझाएंगे कैसे। अगर आपको यह नहीं मालूम था तो ये बनाए ही क्यों गए और कैसे इन्हें रिहायशी और व्यावसायिक इलाकों में चलने की इजाजत दे दी गई। बहुत से सवाल हैं जो हमारे नाकारा नेताओं औऱ भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसी के सामने हैं, लेकिन इनके जवाब और समाधान ढूंढने की बजाय ये अपनी मोटी चमड़ी की तरह मोटी चादर ओढ कर सो जाते हैं।
क्यों नहीं तीन दिन में आग बुझाने के वैकल्पिक समाधान ढूंढे गए।
इतनी बड़ी आग लगने के बाद रातों रात स्वायत्त शासन मंत्री नगर निगम को आदेश देते हैं कि स्नार्कल लैडर खरीदी जाए. आखिर आज तक फायर ब्रिगेड के लिए यह ५४ मीटर ऊंची लैडर खरीदने का फैसला क्यों नहीं किया गया।
सवाल बहुत से हैं और सरकारों के पास उनसे बचने के लिए बहुत सी गलियां। अगर मुश्किल कुछ है तो प्रशासन और सरकार के लिए तो वो है ईमानदारी।
अगर ईमानदारी से वो इस तरह की समस्याओं के समाधान समय रहते खोज ले तो शायद कई जानें और हजारों करोड़ का नुकसान नहीं होता।

Friday, October 30, 2009

अपनी आंखों से देखा विनाश का वह दृश्य


जयपुर में लगी भयानक आग की चर्चा तो आज मीडिया सहित हर जगह हो रही है, पर मैं उन चंद लोगों में से थी जिन्होंने उस हादसे को अपनी आंखों से देखा। सच कहूं तो जिन्दगी में ही पहली बार कोई हादसा एकदम सामने यूं घटते देखा। कल किसी काम से मैं शाम को मां के यहां जा रही थी और उन्हीं के घर से थोड़ी दूरी पर मेरा अपना घर बन रहा है। मैं और नरेन्द्र प्लाट से निकले ही थी कि मैंने देखा आसमान एकदम पीला हो रहा है. मैंने नरेन्द्र से कहा कहीं पीली आंधी तो नहीं आ रही। तभी हमारी आंखों के ठीक सामने जोर का धमाका जैसे कोई बम फट गया है और आग की लपटें। चारों तरफ लाइट चली गई और गहरा अंधेरा। हम दोनों एकदम सन्न। हमने गाड़ी को ब्रेक लगाई। मैंने कहा नरेन्द्र मुझे लग रहा है कहीं कोई बम धमाका तो नहीं हुआ।
हम कुछ समझ नहीं पा रहे थे तभी कुछ लोग अपने घरों से निकले और बोले कि लगता है ट्रांसफारमर जल गया है। सामने आग की ऊंची ऊंची लपटें। हम तो यह तक नहीं समझ पा रहे थे, ये क्या हुआ और कैसे हुआ, हम इस आग से कितनी दूरी पर हैं। तभी हम लोगों ने उस तरफ बढ़ना शुरू कर दिया। डेढ किलोमीटर आगे कुछ लोग अपनी गाड़ियां रोक कर खड़े थे। उन्होंने बताया कि सीतापुरा इंडस्ट्रीयल एरिया के पास इंडियन आ‍यल के आ‍यल डिपो में आग लग गई है। आग धमाके के साथ लगी थी इसलिए वो बम विस्फोट जैसा था। कुछ ही देर में टोंक रोड को बंद कर दिया गया। हम लग रहा था कि आग बस एकाध गली आगे ही लगी है वो हमसे तकरीबन पांच किलोमीटर दूर थी। सोचिए कितना बड़ा धमाका और आग थी जो पांच किलोमीटर से यूं लग रही थी कि बस यही तो है।
हम लोग घर पहुंचे तो टीवी पर भी लगातार यही खबर फ्लैश हो रही थी। आफिस में तो मैंने एक ही मिनट में सूचना दे दी थी , मौके पर फोटोग्राफर्स और रिपोर्ट्स पहुंच ही चुके थे। लगातार सबके टच में थी क्या हो रहा है कितनी कैजुअलटीज हैं।
घर पर भी सबकी सांस सूखी हुई थी। आग आठ किलोमीटर के दायरे में फैली थी औऱ हम आग से केवल पांच किलोमीटर के दूरी पर थे। हालांकि हवा का रूख विपरीत दिशा में होने की वजह से हमारी तरफ कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। लेकिन दूसरी तरफ कुछेक फैक्ट्रियां और शोरूम जलकर खाक हो गए। आज सुबह तक मरने वालों की संख्या पांच थी लेकिन आशंका जताई जा रही है कि २०० से ज्यादा लोग जख्मी हुए हैं उनमें से कुछ बहुत सीरियसली जले हैं, इससे कैजुअलटी का आंकड़ा बढ़ सकता है।
पिछले साल बम धमाके और इस साल आग । वो भी ऐसी जो लगभग २० घंटे बीत जाने पर भी बुझने का नाम नहीं ले रही । आखिर मेरे शहर को किसकी नजर लग गई है। कभी सबसे ज्यादा शांतिप्रिय कहलाने वाला शहर और इस तरह की घटनाओं से दूर रहने वाला शहर आज हर साल कोई न कोई बड़ी आपदा झेल रहा है। आखिर क्यों?

Monday, October 26, 2009

पिंक प्रिंसेस इन हर पिंक वर्ल्ड

...पर इसके लिए बाजार जिम्मेदार है



मेरी छह साल की भतीजी आरूषि। उसे दुनिया में हर चीज पिंक चाहिए। पिंक ड्रेस, पिंक हेयर बैंड पिंक शूज एंड आन एंड आन। वो जब तीन साल की थी तब भी वो जानती थी कि उसे अपनी स्कर्ट के साथ आज पिंक टाप पहनना है और कल मजेंटा फ्राक। आय एम शाक्ड कि इतनी छोटी का रंगो के प्रति ऐसा गजब क्रेज। अभी दीपावली पर वो जयपुर आई तो मैंने मजाक में उसे छेड़ दिया कि उसके कमरे की दीवारों का रंग क्या होगा,
जवाब पिंक,


हम छत तो बनाएंगे नहीं फिर स्काय तो ब्लू होगा
जवाब नहीं मेरे घर का स्काय भी पिंक होगा,
और उनके स्टार
वो भी पिंक
आपके दांत
पिंक
उसे हर चीज पिंक चाहिए पर क्यों जवाब सुनिए क्योंकि पिंक गर्ल्स का कलर होता है न बुआ , आपको ये भी नहीं पता। ये मैं भी जानती हू पिंक गर्ल्स का कलर होता है, जैसा कि सारा बाजार सारा विज्ञापन जगत हमें बताता है। हो सकता है ये मनोचिकित्सक भी बताते हों कि लड़कियों को गुलाबी और लड़कों को नीले रंग लुभाते हैं लेकिन ये बात हमारे दिमाग में इतने गहरे तक कैसे बैठा दी गई है कि हमारा सब कुछ गुलाबी ही होता है।
जब मैं छोटी थी मुझे और मेरी सहेलियों को भी शायद पिंक पसंद रहा होगा , लेकिन हमें बाजार ने यह नहीं सिखाया था कि आपको सभी कुछ गुलाबी ही होना चाहिए। वहीं उसे बार्बी के घर से लेकर हर खिलौने और हर किताब में यही बताया जाता है कि सुंदर और प्यारी लड़कियों का रंग पिंक होता है तभी वो सबकी प्यारी बनी रह सकती है। और हर कोई उन्हें पैम्पर करेगा। कल तक यह कोई नहीं जानता था कि लड़कियों का रंग पिंक और लड़कों का रंग ब्लू होता है लेकिन बाजार ने इसे समझा और इतना जबरदस्त पक़ड़ा कि अब हर कोई तय करता है कि उसके बेटे के कमरे की दिवारों का रंग और बेटी के कमरों की दीवारों का रंग फ्लां होगा।
आखिर उस छोटी बच्ची के दिमाग में कहीं न कहीं हमने ही यह बात डाली होगी कि गुलाबी रंग उसे बाकी बच्चों में सर्वश्रेष्ठ बना देगा। हमें भी बाजार ने यह सिखाया होगा। लेकिन हम इसकी जब जरूरत होगी तभी इस्तेमाल करते हैं। पर वो बच्ची जो छह साल में इस रंग से इतना जबरदस्त बंध चुकी है वो अब ताउम्र इसकी मरीचिका से बाहर नहीं आ पाएगी। ये केवल एक रंग की ही बात नहीं है, ये बात आपके हमारे लाइफस्टाइल की है जो अब बाजार तय करता है,बाजार जो सीधा बगैर हमें माध्यम बनाए वहां तक पहुंच रहा है। कार्टून्स के जरिए, टीवी सीरियल्स, एड। कहां कहां से वो आपके बच्चे को बताता है कि इस ब्रांड का बर्गर खाओ, इस ब्रांड का कपड़ा पहनो, फ्लां चाकलेट और फ्ला नूडल खाओ। हम कहां तक और कैसे इसे रोकेंगे और ताउम्र के लिए बच्चों को कैसे इन चीजों से बचा पाएंगे।

Wednesday, October 14, 2009

मन नाद दे



नवनीत गुर्जर



स्टेट एडिटर दैनिक भास्कर राजस्थान




म न भी ब्रह्र। नाद भी ब्रह्म। जो मन से नाद को मिलाए वही मन्ना डे। दरअसल, हवा की तरह संगीत का भी कोई सिरा नहीं होता। शिखर कहीं भी हो सकता है। शुरुआत में भी। आखिर में भी और बीच में भी। मन्ना डे को कुछ इस तरह समझना होगा..
संगीत में सुर दो तरह के होते हैं। विचलित और अविचलित। विचलित वे पांच सुर हैं, जो कोमल भी होते हैं और तीव्र भी। दो सुर- षड्ज और पंचम स्थायी होते हैं। अविचलित और अडिग। न कोमल। न तीव्र। मन्ना डे षड्ज और पंचम के मिश्रण हैं।
षड्ज उनकी आवाज में भारीपन लाता है और पंचम उसमें मुर्कियां पिरोता है। इसीलिए वे मंद्रसप्तक में भी मुर्कियों का प्रयोग करने में माहिर हैं। उनकी यही खासियत उन्हें बाकी गायकों से अलग बनाती है। ‘हंसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है’ में ‘की’ में इतना सुंदर कम्पन मन्ना डे ही दे सकते हैं। एक तरफ वे ‘झनक-झनक तोरी बाजे पायलिया’ की शास्त्रीयता को अक्षुण्ण रखते हैं और दूसरी तरफ ‘ए मेरी ज़ोहरा ज़बी..’ में भारी आवाज के बावजूद शोखी पैदा करते हैं।
यह ‘वक्त’ का तकाजा नहीं, मन्ना दा की गायकी का कमाल है कि यह गाना तब बलराज साहनी पर भी मौजूं था और आज 35 साल बाद का युवा और 90 साल का बुजुर्ग भी इसे अपनी जीवनसाथी के लिए बड़े चाव से गाता है। वे सुरों की खूबसूरती को पात्र के हालात में पिरोते हैं। उनकी आवाज का दर्द उसमें भावनाएं भरता है। यही वजह है कि ‘ऐ मेरे प्यारे वतन..’ को आज भी कोई भारतीय, खासकर बेटी का पिता बिना रोए नहीं गा सकता।
मन्ना डे के व्यक्तित्व और गायकी की महानता यही है कि इतनी खूबियों के बावजूद वे आज के गानों से दूर रहे। षड्ज और पंचम की तरह अटल भी और कर्णप्रिय भी। कह सकते हैं- आधुनिक गानों और उनकी आय की चाह में वे कभी ऋषभ, गंधार या मध्यम नहीं हुए।
षड्ज और पंचम की तरह चिर स्थाई ही बने रहे। फाल्के अवार्ड उन्हें पाकर धन्य हो गया। धन्य इसलिए कि 1959 में नेशनल अवार्ड पाने वाले मन्ना डे को 40 साल बाद फाल्के अवार्ड देना सम चूकने जैसा है। प्रतिक्रिया में संगीत का सामान्य जानकार भी यही कह रहा है।

Tuesday, October 13, 2009

शब्द

बहुत दिनों पहले देर रात एक विदेशी फिल्म के लिरिक्स सुने थे, फिर सो नहीं सकी। घंटों बाद जो याद रहा, उसे अपने लफ्जों से रफू करके कागज पर उतार दिया, जिन्हें अब ब्लाग पर पोस्ट कर रही हूं

शब्द, जिन्हें कहना था
शब्द जो जुबां पर आते-आते हमेशा ठहर गए
शबद, जिन्हें बेहतरीन किताबों, शब्दकोशों से चुना गया था
...शब्द, जो यादों में हमेशा तैरते थे
शब्द जिन्हें प्रेम के सबसे खुशनुमा पलों में
हर प्रेमी अपनी प्रेमिका से कहता है
शबद, जिन्हें संभाले-संभाले एक अर्सा गुजर चुका है
शब्द, जिन्हें मैं हमेशा से कहना चाहती थी
पर मैं दुनिया की सबसे डरी हुई इंसान हूं
और तुम सबसे बेफिक्र
...और अब मैं बेहद अकेली
स्याह उदास रातें मुझे अब भी डराती हैं
मेरे चेहरे पर आ रही महीन रेखाएं मुझे बता जाती हैं
कि मैं कितनी अकेली हूं
खैर, अब मुझे इससे खास फर्क नहीं पड़ता हालांकि
शब्द,अब भी बसे हैं यादों में, जिन्हें कहना था
लेकिन कभी कहा नहीं जा सका
...क्योंकि उन्हें कभी कहना ही नहीं था

Sunday, October 11, 2009

शांति के साथ क्रूरता

कल्पेश याग्निक
नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर


विश्व शांति के लिए 1994 में जब प्रमुख लड़ाकू फिलीस्तीनी नेता यासेर अराफात को नोबेल मिला था तो मखौल उड़ा था कि ‘क्या इस बार पुरस्कार के लिए हत्यारा होना शर्त थी?’ अब जबकि बराक ओबामा को यह सम्मान दिया गया है तो पूछा जा रहा है : क्या इस बार सिर्फ ‘बातें’ काफी थीं? कि एक पखवाड़े में आप विश्व शांति पर कितनी बात कर सकते हैं- यह परखा जा रहा था?जानना जरूरी होगा कि ओबामा ने 20 जनवरी 2009 को अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में काम शुरू किया। नोबेल शांति पुरस्कार के नाम लेने की अंतिम तारीख 1 फरवरी 2009 थी। यानी 11 दिन के उनके कार्यकाल पर उन्हें विश्व में अमन स्थापित करने का सम्मान दे दिया गया! यही नहीं, निर्णायकों ने अपने वोट जून में दे दिए थे- यानी तब भी चार माह हुए थे ओबामा के उन प्रयासों को, जो किसी और को तो खैर दिखे तक नहीं, किन्तु नोबेल कमेटी को ‘असाधारण, अद्वितीय’ लगे। सम्मान की घोषणा वाले दिन तक भी वे नौ माह पुराने ही ‘शांति के क्रांतिकारी’ हैं।संभवत: काहिरा में उनके भाषण का यह कमाल था। इसमें उन्होंने ‘अस्सलाम् वाएलेकुम’ कहकर अरब जगत को चौंका दिया था। हालांकि इजराइल-फिलस्तीन में अमन-चैन बढ़ाने वाले उनके जिन कथित प्रयासों की प्रशंसा नोबेल कमेटी ने की है- वे वास्तव में कहीं नजर ही नहीं आ रहे। यरुशलम में आज भी वैसी ही हिंसा भड़की हुई है। जिस रूस के बारे में उनकी बातचीत को ‘महान’ बताया जा रहा है- उसने भी कोई कागज नहीं दिखाया है और न कोई हस्ताक्षर कहीं किए हैं। यूं भी सोवियत संघ से बिखरकर रूस रह जाने की टीस क्रेमलिन को खोखला कर चुकी है। कुछ कर भी दिया तो इससे विश्व को क्या मिलेगा।ओबामा को सर्वोच्च सम्मान देना नोबेल कमेटी की विवशता हो सकती है और किसी को इससे फर्क भी नहीं पड़ता। प्रश्न केवल यह है कि कभी अंतरराष्ट्रीय पुलिस तो कभी विश्व के न्यायाधीश का भेष बनाने/बदलने वाले अमेरिका के उस राष्ट्रपति को आप कैसे यह तमगा जड़ सकते हैं, जिसने न तो इराक से अपनी सेनाएं वापस ली हैं,न ही अफगानिस्तान से। हमारे देश के परमाणु परीक्षण पर क्रंदन कर चुके अमेरिका के स्वयं के हथियारों में ओबामा ने क्या कमी की है? आज तो विश्व यह जानना चाहता है। यदि प्रमुख सैन्य जर्नल्स और किताबों पर निगाहें डालें तो पता चलता है कि ओबामा के नेतृत्व में वॉशिंगटन के पास आज 5500 से अधिक वॉरहेड्स हैं। यानी शक्तिशाली संहारक- परमाणु हथियारों और बमों- का सक्रिय जखीरा। और तिस पर वे बने हुए हैं हथियारों को समाप्त करने के अभियान के सिरमौर। बल्कि अब तो इस सम्मान में उन्हें ‘हथियारों की समाप्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ आव्हान करने वाला’ कहा गया है। आव्हान यानी वही-बातें। सब कुछ कर लेने, सब कुछ पा लेने के बाद होता ही क्या है-बातें।विश्व में परमाणु हथियार बनाने वाला पहला देश अमेरिका था। द्वितीय विश्वयुद्ध में हिरोशिमा-नागासाकी को तबाह कर वह एकमात्र ऐसा देश भी बन गया-जिसने इन हथियारों का वास्तविक उपयोग निर्दोषों का रक्तपात कर किया। आज विश्व के सात परमाणु देशों-अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, हिंदुस्तान और पाकिस्तान में कुल मिलाकर जितने एटमी बम होंगे(कोई 22-23 हजार), उनसे तीन गुना अधिक अमेरिका के पास रहे हैं। आज भी उसने हथियार जरूर कम कर दिए हैं, लेकिन क्षमता सर्वाधिक है।हमसे परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर दबावपूर्वक चाहते हैं-जबकि हमारी अघोषित, अनुमानित क्षमता बमुश्किल 30-35 वॉरहेड्स होगी। हमसे तो पाकिस्तान ने गुपचुप ज्यादा हथियार बना रखे हैं-जिसे लगातार अरबों डॉलर की मदद इन्हीं ओबामा के हस्ताक्षरों से दी जा रही है। उस पैसे को हमारे विरुद्ध चोरी के हथियारों पर खर्च किया जा रहा है- लेकिन सब कुछ सुन-समझ चुकने पर भी ओबामा क्या करते हैं-बातें। बेहतर तो होता कि उम्र, अनुभव और अभ्यास तीनों मानदंडों पर ‘अभी कम होने’ की विनम्रता दिखाते हुए ओबामा स्वयं इसे लेने से इनकार कर देते। किन्तु उनकी विनम्रता का तकाजा कुछ और रहा होगा। चाहे हमें वह क्रूर लगे।