13 मई को जयपुर बम धमाकों को पूरा एक साल हो गया। इन बम धमाकों में जिन्होंने अपने खोए उनका दुख तो वैसे का वैसा है, वो कुछ नहीं भूले हैं। लेकिन निकम्मी सरकारें और पुलिस प्रशासन भूल चुका है वो दर्द और आंसू जो इन लोगों की आंखों से बहे हैं।
कल का दैनिक भास्कर इन्हीं परिवारों के नाम था,जिन्होंने अपनों को खोने का दुख उठाया है, उनकी हिम्मत जज्बे औऱ हौसले के नाम, जिसके भरोसे उनकी जिंदगी आगे बढ रही है।
आतंक के विरुद्ध युद्ध सिर्फ धोखा
कल्पेश याग्निक
तबाही झेलते लोगों ने ही दिखाया जज्बा, सरकारें तो जज्बातों से खलेती रहीं
‘अब तो उन सरकारों के ही स्कैच जारी करने चाहिए, जो पूरे एक साल में भी हमारे गुनहगारों को छू तक न सकी।’ पिछले साल 13 मई को धमाकों से पथराए इन परिवारों को शब्द देता जयपुर का यह सिर्फ गुस्सा नहीं है। हूक है। उससे भी बढ़कर हक है।
हूक यह है कि निर्दोष जिंदगियों को निर्दयता से नष्ट करने वालों के नाम तक ठीक से पता न कर सके। हक इसलिए कि जिन्होंने खोया, उनके लिए दुआ मांगते समय किसी ने उनका नाम नहीं देखा। न ही मदद के लिए हाथ बढ़ाते वक्त अपना नाम बताया।

हूक उठती है कि राज्य के सत्ताधीशों का संवेदना जताने का जतन छद्म निकला। केंद्र में आसीन शासकों का संकल्प सिर्फ शोर निकला। हक है हमें इन सभी से तीखे प्रश्न करने का। दंड देने का। क्योंकि कितनी ही मां, और जाने कितने पिता हैं, जिनका 365 दिनों में, दिन ही न निकला। वो तो धन्य है जयपुर, जो अंधेरे में उजाला जगाता रहा।
हूक सबसे अधिक इस पर उठती है कि हमें छला जा रहा है। 2002 में एक सरकार पोटा जैसा कठोर कानून लाती है, किंतु उसे कागज पर स्याह इबारत बनाकर ही रखती है। दहशतगर्दियों की मेहमानों की तरह सेवा कर चुके इस दल के कर्णधार किस मुंह से ‘लौह पुरुष’ कहलवाना चाहते हैं, आश्चर्य ही है। फिर एक और शासक आते हैं। सबसे पहले उस कानून को बर्खास्त करते हैं। फिर आतंक के सामने नतमस्तक हो, जयपुर सहित समूचे देश में हमले पर हमले बर्दाश्त करते हैं। सारा राष्ट्र कमजोर हो जाए - किंतु स्वयं को कोई ‘कमजोर’ कहे, यह सहन नहीं कर पाते हैं। हक है उन टूट चुके लोगों का कि ऐसे दंभ को तोड़ें। लौह में लगे जंग को फोड़ें।
हूक इस पर भी कि तड़पते, मृत्यु को प्राप्त होते मनुष्यों की तो रक्षा न कर पाए - कानून के रखवालों ने स्वयं को सुरक्षित कर लिया। जिस खुफिया तंत्र की विफलता के कारण इतना रक्तपात मचा, उसी के मुखिया ने अपने लिए अभिजात्य कमांडो दस्ता तैनात करने के इरादे से जेड प्लस सुरक्षा मांग ली। वह भी तब, जब एक सत्ता समाप्त और दूजी काबिज होने को थी।
हक है हमें यह पूछने का कि क्या यही है विश्वभर में चल रहा ‘आतंक के विरुद्ध युद्ध’? हक है हमें जानने का कि वे आततायी आखिर थे कौन? उन्हें गिरफ्त में न ले सके - तो हक है हमें जानने का कि आखिर वे कौन-कौन हैं, जिन्हें जिम्मा दिया गया था आतंकियों को पकड़ने का? उनकी सूरत भी सबके सामने आनी चाहिए। शर्मनाक है कि संदिग्धों के सारे स्कैच झूठे निकले। क्या पता इनका पता लगाने वाले कितने सच्चे रहे होंगे? धक्का पहुंचता है यह जानकर कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के आतंक विरोधी उपायों की ताजा रिपोर्ट में आतंकवाद नष्ट करने के कई मामलों में हमारे देश को ‘शून्य’ मिला है।
क्या ‘आतंक के विरुद्ध युद्ध’ सिर्फ एक धोखा है? इस संदेह पर दिल से हूक उठना तय है - किंतु आपको कोई हक नहीं कि आप ऐसा संदेह करें। आइए, सरकारों को हांकें कि वे जगें, नहीं भी जगीं तो हम राजस्थानियों का हौसला ही आतंक के मुकाबले को काफी है।