Tuesday, July 14, 2009

नो सीएम आफ्टर एट पीएम



राजस्थान विधानसभा में ऐसा भी होता है


?गर मैं तुम्हारी पत्नी के बारे में कहूं

?ो सीएम आफ्टर एट पीएम
?े जुमला पूरे राजस्थान ने पिछले पांच साल तक बहुत बार सुना,अलग-अलग लोगों के मुंह से सुना और हर बार इसके अर्थ अलग ढंग से लगते रहे। कभी नाराजगी भरे लहजे में कभी तंज तो कभी मजाक। पर ये मुद्दा विधानसभा के गलियारों में गूंजेगा ये तो किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था।
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पिछली सरकार द्वारा शराब की खुलेआम बिक्री के खिलाफ तो थे ही उन्होंने सत्ता में आते ही न सिर्फ दुकानों का समय कम करवा दिया , बल्कि उसे फिर से दबी छुपी स्थिति में पहुंचा दिया। (बस गुजरात की तरह शराब बंदी लागू नहीं की)
तो जनाब अति उत्साह में बजट भाषण में हमारे सीएम साहब कह गए, 8 बजे बाद शराब नहीं पीएं या 8 से पहले पी लें या फिर घर पर धीरे-धीरे पी लें। अब इस बात को लेकर कल विधानसभा में भाजपा विधायक भवानी सिंह राजावत ने चुटकी ले ली। लेकिन कांग्रेसी कहां पीछे रहने वाले थे। उन्होंने भी कह दिया शराब पर डिबेट कराना चाहते हो तो करा लेते हैं। आप जो बात हमारे मुख्यमंत्री के लिए कह रहे हैं। तो अपने नेता की तरफ भी देख लें। फिर काफी कुछ ..... और रघु शर्मा बोल उठे आफ्टर एट पीएम नो सीएम। भाजपा के राज में आठ बजे बाद जनता सीएम को ढूंढती रहती थी।
बड़ी देर से शांत बैठी पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी अब बोल उठीं। हाउस में ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं करें। लेकिन तूतू-मैं मैं बढ़ती गई और राजे ने कहा कि आपको इस असभ्य भाषा के लिए अपोलोजी करनी चाहिए। अगर मैं यह कह दूं कि आपकी पत्नी रोज शाम को शराब पीकर नाचती है तो...यह कोई बात है कि आफ्टचर एट पीएम नो सीएम

Wednesday, May 13, 2009

जयपुर बम धमाकों का एक साल

13 मई को जयपुर बम धमाकों को पूरा एक साल हो गया। इन बम धमाकों में जिन्होंने अपने खोए उनका दुख तो वैसे का वैसा है, वो कुछ नहीं भूले हैं। लेकिन निकम्मी सरकारें और पुलिस प्रशासन भूल चुका है वो दर्द और आंसू जो इन लोगों की आंखों से बहे हैं।
कल का दैनिक भास्कर इन्हीं परिवारों के नाम था,जिन्होंने अपनों को खोने का दुख उठाया है, उनकी हिम्मत जज्बे औऱ हौसले के नाम, जिसके भरोसे उनकी जिंदगी आगे बढ रही है।


आतंक के विरुद्ध युद्ध सिर्फ धोखा


कल्पेश याग्निक
तबाही झेलते लोगों ने ही दिखाया जज्बा, सरकारें तो जज्बातों से खलेती रहीं

‘अब तो उन सरकारों के ही स्कैच जारी करने चाहिए, जो पूरे एक साल में भी हमारे गुनहगारों को छू तक न सकी।’ पिछले साल 13 मई को धमाकों से पथराए इन परिवारों को शब्द देता जयपुर का यह सिर्फ गुस्सा नहीं है। हूक है। उससे भी बढ़कर हक है।
हूक यह है कि निर्दोष जिंदगियों को निर्दयता से नष्ट करने वालों के नाम तक ठीक से पता न कर सके। हक इसलिए कि जिन्होंने खोया, उनके लिए दुआ मांगते समय किसी ने उनका नाम नहीं देखा। न ही मदद के लिए हाथ बढ़ाते वक्त अपना नाम बताया।

हूक उठती है कि राज्य के सत्ताधीशों का संवेदना जताने का जतन छद्म निकला। केंद्र में आसीन शासकों का संकल्प सिर्फ शोर निकला। हक है हमें इन सभी से तीखे प्रश्न करने का। दंड देने का। क्योंकि कितनी ही मां, और जाने कितने पिता हैं, जिनका 365 दिनों में, दिन ही न निकला। वो तो धन्य है जयपुर, जो अंधेरे में उजाला जगाता रहा।
हूक सबसे अधिक इस पर उठती है कि हमें छला जा रहा है। 2002 में एक सरकार पोटा जैसा कठोर कानून लाती है, किंतु उसे कागज पर स्याह इबारत बनाकर ही रखती है। दहशतगर्दियों की मेहमानों की तरह सेवा कर चुके इस दल के कर्णधार किस मुंह से ‘लौह पुरुष’ कहलवाना चाहते हैं, आश्चर्य ही है। फिर एक और शासक आते हैं। सबसे पहले उस कानून को बर्खास्त करते हैं। फिर आतंक के सामने नतमस्तक हो, जयपुर सहित समूचे देश में हमले पर हमले बर्दाश्त करते हैं। सारा राष्ट्र कमजोर हो जाए - किंतु स्वयं को कोई ‘कमजोर’ कहे, यह सहन नहीं कर पाते हैं। हक है उन टूट चुके लोगों का कि ऐसे दंभ को तोड़ें। लौह में लगे जंग को फोड़ें।
हूक इस पर भी कि तड़पते, मृत्यु को प्राप्त होते मनुष्यों की तो रक्षा न कर पाए - कानून के रखवालों ने स्वयं को सुरक्षित कर लिया। जिस खुफिया तंत्र की विफलता के कारण इतना रक्तपात मचा, उसी के मुखिया ने अपने लिए अभिजात्य कमांडो दस्ता तैनात करने के इरादे से जेड प्लस सुरक्षा मांग ली। वह भी तब, जब एक सत्ता समाप्त और दूजी काबिज होने को थी।
हक है हमें यह पूछने का कि क्या यही है विश्वभर में चल रहा ‘आतंक के विरुद्ध युद्ध’? हक है हमें जानने का कि वे आततायी आखिर थे कौन? उन्हें गिरफ्त में न ले सके - तो हक है हमें जानने का कि आखिर वे कौन-कौन हैं, जिन्हें जिम्मा दिया गया था आतंकियों को पकड़ने का? उनकी सूरत भी सबके सामने आनी चाहिए। शर्मनाक है कि संदिग्धों के सारे स्कैच झूठे निकले। क्या पता इनका पता लगाने वाले कितने सच्चे रहे होंगे? धक्का पहुंचता है यह जानकर कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के आतंक विरोधी उपायों की ताजा रिपोर्ट में आतंकवाद नष्ट करने के कई मामलों में हमारे देश को ‘शून्य’ मिला है।
क्या ‘आतंक के विरुद्ध युद्ध’ सिर्फ एक धोखा है? इस संदेह पर दिल से हूक उठना तय है - किंतु आपको कोई हक नहीं कि आप ऐसा संदेह करें। आइए, सरकारों को हांकें कि वे जगें, नहीं भी जगीं तो हम राजस्थानियों का हौसला ही आतंक के मुकाबले को काफी है।

Saturday, May 9, 2009

अभी पाठ मुझे याद नहीं कामरेड

अकसर मेरे दोस्त मुझसे इस बात पर आर्ग्युमेंट करते हैं कि मैं राजनीति पर बात करने से बचती हूं। उन लोगों के साथ राजनीतिक बहसों में भी भाग नहीं लेती। पर मुझे लगता है कि अभी राजनीति पर मैं उतना नहीं पढ़ पाई हूं जिसे मैं पर्याप्त मानती हूं। मार्क्स और कम्यूनिज्म पर जो कुछ भी पढा था, वो इतने सालों पहले पढ़ा था कि वो अब बस टुकड़ों में ही याद है। कुछ बातों मेरा मानना है कि जब तक विशेषज्ञता हासिल न हो जाए तो उसमें खुद को कुछ मान लेना वैसे भी बेवकूफी है। इस मामले में थोड़ी सी युधिष्ठिर की भी फोलोअर हूं। नरेंद्र कोहली के महासमर में एक किस्सा है। गुरु द्रोण ने सभी शिष्यों को गुस्सा नहीं कनरे का पाठ पढ़ाया और उस समय की श्रुति परंपरा के अनुसार याद करने के लिए दिया। पर युधिष्ठिर कई दिनों तक याद नहीं कर पाए। आखिरकार एक दिन गुरु द्रोण ने उनकी जमकर पिटाई की और तब भी जब उसे गुस्सा नहीं आया तो युधिष्ठिर ने स्वीकारा, हां, गुरुवर मुझे पाठ स्मरण हो गया है।फिलहाल मुझे अपने पाठ पूरी तरह से याद नहीं है और जब तक मैं इन्हें याद नहीं कर लेती नो आर्ग्युमेंट्स आन पालिटिक्स कामरेड।देश की मौजूदा राजनीति में मुझे कोई ऐसा रीढवाला नेता नजर नहीं आता जिसके पास वाकई कोई नीति या धारणा हो। जिन्हें फालो किया जा सके या उन पर बहस की जा सके। तो इसलिए जब तक कोई नई विचारधारा अस्तित्व में आए या पुराने पर इतना पढ़ लिया जाए कि उस पर बात हो , तबतक कहीं कोई बात नहीं।

Thursday, May 7, 2009

टैक्नोलाजी, बच के रहना

कल एक ब्रिटिश अखबार पढते-पढते एक ऐसी खबर सामने आई कि लगातार दिमाग में घूम रही है। एक महिला का अपने पति से झगड़ा हो गया और गुस्से में एज यूजअल हम सब की तरह वो भी नेट की शरण में आ गईं। इसी नाराजगी में उन्होंने फेसबुक पर अपना स्टेटस मैरिड से सिंगल कर दिया। उस छोटे से कस्बे की महिला को ये पता नहीं था कि फेसबुक स्वत उसके सारे परिचितों को यह मेल भेज देगा कि उन महिला का स्टेटस मैरिड से सिंगल हो गया है। कस्बे में इस बारे में बात होने लगी और जब रात को उसका पति वहां के लोकल पब में गया तो उसे फिर से सिंगल होने के कमेंट मिले। घर लौटकर महिला ने अपने पति से इस बारे में माफी मांगी और कहा कि उसे बिलकुल आइडिया नहीं था कि फेसबुक उसके इस बेवकूफी को ऐसे प्रचारित कर देगी, वो बिलकुल सीरियस नहीं थी और उसने बस यूं ही स्टेटस चेंज कर दिया था। सारे क्लेरिफिकेशन्स के बावजूद पति इस बात से काफी टेंशन में रहा और दो दिन बाद उसका सीरियस एक्सिडेंट हो गया और फिलहाल वो कोमा में है।

Saturday, April 11, 2009

एक और शुरुआत के लिए राजीव को बहुत बधाई

हमारे पुराने कलिग और ब्लागर साथी राजीव जैन को कल फोन किया तो पता चला कि वे सगाई करके लौटे हैं। फोन तो मैंने किताब के सिलसिले में किया था पर मुझे पूर्वाभास हो गया था कि वो कोई अच्छी खबर सुनाने वाले हैं। राजीव से जब खुशखबरी पूछी गई तो बड़े शरमाते हुए बताया कि साहब सगाई करके लौटे हैं। बधाई वधाई हमारी तरफ से सूखी सूखी तो हो गई है पर अब मिठाई के साथ ही बधाई पूरी होगी भई, सुन रहे हैं न राजीव।राजीव राजस्थान पत्रिका में मेरे कलिग भी रहे हैं और कापी पढ़ने में काफी अच्छे हैं। हम दोनों ने ब्लागिंग भी लगभग साथ साथ ही शुरू की थी। वो शुरूआत नाम से ब्लाग लिखते हैं, जब भी तकनीकी रूप से मैं कहीं अटकती हूं तो अकसर राजीव ही उसे सुलझाते हैं।
अपने-अपने अखबारों में छप रही खबरों औऱ गलतियों पर भी हम लोग अकसर चर्चा करते हैं। तो राजीव एक बार फिर से बहुत बहुत बधाई ।

Monday, March 23, 2009

आचार संहिता के नाम पर लोगों को ठगती निकम्मी अफसरशाही

हमारे देश में लालफीताशाही के निकम्मेपन और भ्रष्टाचार के किस्से तो हर कोई जानता-सुनता है लेकिन हद तो यह हो गई है कि अब बाबू लोग चुनावों के दौरान लगने वाली आचार संहिता के नाम पर भोलेभाले लोगों को बेवकूफ बना रहे हैं। वो काम जिनका संहिता से दूर दूरतक कोई लेना देना नहीं है, उनको लेकर भी आचार संहिता के नाम पर रोका जा रहा है।

दैनिक भास्कर ने इस बार एक ऐसी मुहिम छेड़ी और राजस्थान में जो काम आचार संहिता के नाम पर रोके जा रहे थे, उनके बारे में जानकारी इकट्ठा की और प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी विनोद जुत्शी से बात की और उन्होंने स्वयं साफ किया कि आचार संहिता में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि जिससे काम रोक दिए जाएं।

मजेदार बात यह थी कि यह कोई खोजपरक रिपोर्टिंग नहीं थी, चोरीछिपे कहीं कोई तथ्य नहीं जुटाए गए, उसके बावजूद संवाददाताओं के सामने चीजें आइनों की तरह साफ थीं, छोटे-छोटे काम केवल अपने निकम्मेपन की वजह से अफसरशाही ने रोक रखे थे। काम अटकाने के लिए तो एक छोटा सा बहाना ही बहुत है।

Thursday, February 19, 2009

ये जेंडर के साथ-साथ संख्या का भी प्रॉब्लम है

एनडीटीवी से जुड़े पत्रकार रवीश कुमार ने कुछ दिन पहले अपने ब्लाग पर एक पोस्ट लिखा था, क्या ये जेंडर का प्राब्लम है? वाकई अच्छा पोस्ट था। टीवी पर वही समस्या जो हम-सब आप रोजाना फेस करते हैं, रवीशजी ने उसी प्राब्लम को बहुत बढ़िया तरीके से विश्लेषित किया है। हालांकि मैं यह पोस्ट थोड़ी देरी से पढ पाई इसका अफसोस है, लेकिन यह अफसोस इतने सारे कमेंट्स पढ़कर अफसोस नहीं रहा। मैंने यह रवीश जी के ब्लाग पर टिप्पणी के रूप में लिखा था, लेकिन यह इतना बड़ा हो गया कि मैं इसे अलग पोस्ट के रूप में लिख रही हूं।
टीवी की आक्रामक भाषा और चाकू की तरह दिमाग में जख्म करती स्क्रिप्ट्स हम सभी को परेशान करते हैं, आपके एक प्रोफेसर मित्र ने इसका एक अलग सा विश्लेषण भी कर दिया, जो कहीं न कहीं जेंडर बहस भी खड़ी कर रहा था। और आपने उससे भी बेहतर ढंग से समझाया। एंकर तो आपको बड़ी संख्या में महिलाएं या लड़कियां मिल जाएंगी लेकिन जब बात का‍पी लिखने की आती है या रिपोर्टिंग की आती है तब लड़कियां कहां खो जाती हैं। बात बहुत सही भी है, ज्यादातर एंकर लड़कियां होंगी, इस बात पर हम सब का बस चलता भी तो कितना है, यह तो मालिक या मैनेजमेंट तय कर देता है कि एंकरों में कितनी स्त्रियां रहेंगी और पुरूष। रही कापी लिखने की बात,शायद लड़कियां कापी लिखतीं तो वो अलग ही तरह की होती। मेरा ख्याल है कि यह भाषा किसी सभ्य आदमी की हो ही नहीं सकती है कि घर में घुसकर मारो पाकिस्तान को। जब कोई सभ्य लड़का ही ऐसा भाषा को प्रयोग नहीं करता है तो लड़कियां से ऐसी आशा करना ही बेमानी है।मैं भी प्रिंटर डेस्क पर ही काम करती हूं, वो भी अखबार में । जहां मैं लगभग हर रोज पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तालिबान, ओसामा बिन लादेन और अमेरिका पर स्टोरीज लिखती या रीराइट करती हूं। पर मुझे याद नहीं आता कि मैंने या मेरे साथियों ने कभी भी इतनी ओछी भाषा का प्रयोग किया हो। मेरा मानना है टीवी में भी यदि ज्यादातर लड़कियां स्क्रिप्ट्स लिखने लगें तो इतनी हल्की भाषा का प्रयोग तो नहीं ही होगा।आपके कमेंट्स में भी लोगों ने मजेदार विश्लेषण लिखे हैं- मुंबई से किसी ने लिखा है ज्यादातर महिला पत्रकारों को भाषा से ज्यादा अपने मेकअप की चिंता होती है ... वो वही पढ़ती है, जो लिखा रहता है ..भाषा के मतलब से उन्हें क्या मतलब है . शायद इन महोदय को यही पता नहीं है कि मेकअप एंकर के लिए होता है, हर महिला पत्रकार एंकर नहीं होती है। भैया आईआईएमसी में आज भी मैक्सिमम लड़कियां टा‍प करती हैं आपको नहीं पता हो तो मैं बता दूं। जिस साल मैंने भी मा‍स को‍म में डिप्लोमा किया था ज्यादातर लड़कियां टापर थीं। वहां पर स्टूडेंट्स का‍पी लिखने और रिपोर्टिंग करना ही सीखते हैं,अगर ये वहां का सच है तो आय एम सा‍री आप आइने की एक तरफ ही देख रहे हैं दूसरा हिस्सा भी देखिए।
हिन्दी में स्थिति जरूर अलग है, यहां पर लड़कियां लड़कों के मुकाबले कम हैं। यह एक बड़ा कारण है कि ज्यादातर महिलाएं कापी और स्क्रिप्ट में नहीं दिखती।
ज्यादातर हिन्दी के अखबारों में पांच-सात महिलाओं से ज्यादा नहीं हैं, जहां है भी उन्हें महिला परिशिष्ट या सिटी पेजिज में लगाकर इतिश्री कर ली जाती है। ऐसे में आप कैसे महिलाओं से ये एक्सपेक्टेशन रखते हैं कि वे आपको हर रोज पालिटिकल या अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर कापी लिखती हुई मिलेंगी।

Saturday, February 14, 2009

13 साल का बच्चा बना पिता

ब्रिटेन में 13 साल का एक लड़का पिता बन गया है। उसकी गर्लफ्रेंड और बच्चे की मां 15 साल की है। मजेदार बात यह है कि एल्फी अभी खुद ही बच्चा लगता है। एल्फी तो अभी ये नहीं जानता कि एक नैपी की कीमत क्या होती है और वह बच्ची का खर्च कैसे उठाएगा। हालांकि एल्फी ब्रिटेन का सबसे छोटा पिता नहीं है इससे पहले १२ साल की उम्र में एक और लड़का पिता बन चुका है।


एल्फी जब 12 साल का था तभी उसकी गर्लफ्रेंड चैंटिल स्टीडमैन गर्भवती हुई थी। एल्फी को जब अपनी गर्लफ्रेंड चैंटिल के गर्भवती होने का पता चला तो पहले तो वह बहुत घबराया औऱ लंबे समय तक दोनों ने अपने मां-बाप को यह बात नहीं बताई, लेकिन फिर उन्होंने बच्चे को जन्म देने का फैसला किया। एल्फी को ये भी नहीं पता कि वो बच्ची का लालन-पालन कैसे करेगा। वो कहता है उसे कभी जेबखर्च भी नहीं मिलता। हां, कभी-कभार पापा 10 डॉलर जरूर दे देते हैं।
एल्फी और चैंटिल की कहानी काफी दिलचस्प है। दोनों को गर्भ ठहर जाने का पता तब चला जब उसे 12 हफ्ते का गर्भ था। इसके बावजूद दोनों ने छह हफ्ते तक इसे राज ही रहने दिया। एक दिन चैंटिल की मां ने देखा कि उनकी बेटी का वजन बढ़ रहा है व पेट में सूजन हो गई है। पूछने पर सारी स्थिति साफ हो गई।

रूढीवादी देशों में गिने जाने वाले ब्रिटेन में इस बच्ची के जन्म ने एक नई बहस छेड़ दी है। वहां इतनी कम उम्र में बच्चे सेक्स के बारे में जानने लगते हैं, जबकि तब तक वे ठीक से खुद को और बहुत बेसिक चीजों को भी नहीं जानते। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2006 में ब्रिटेन में 18 साल से कम उम्र की 39,000 लड़कियां प्रेग्नंट हुईं। वहां इस तरह के बढ़ते मामलों के चलते सेक्स एजुकेशन को सिलेबस में जोड़ने की बात हुई है। इसके मुताबिक वहां के केजी क्लास के बच्चों को भी सेक्स के बारे में पढ़ाया जाएगा। लेकिन यह स्थिति वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है, यह उम्र न तो यौन व्यवहार की है और न ही इस तरह की जिम्मेवारियों को उठाने की। अमेरिका और यूरोप में कम उम्र में बच्चे होने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं और अब वहां की सरकारों को केवल गर्भ निरोधक बांटने के बजाय कुछ और ठोस कदम उठाने की जरूरत है।

Monday, February 9, 2009

डोंट फाल इन लव

वाकई प्यार में पड़ना आसान नहीं है और यदि प्यार हो गया तो इसे निभाना और भी मुश्किल है।
वो कहते हैं न
ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब कर जाना है
बस मुझे ये फोटो मेल पर इतना पसंद आया कि मैंने सोचा क्यूं न ब्लाग पर डाल दिया जाए, तो अगर आप भी प्यार में पडने जा रहे हैं तो जरा सोच लीजिए, एडजस्टमेंट्स तो करने ही होंगे।



Friday, February 6, 2009

दीपक के ब्लाग से चोरी

दीपक या प्यार से मैं उसे दीपू कहती हूं, दो साल पहले तक मैं उसे जानती भी नहीं थी और आज वो मेरा छोटा भाई है। रिश्ता तो कुछ नहीं था, पर कई बाद जिन्दगी में रिश्ते यूं ही जुड़ते चले जाते हैं। रिश्ता था तो केवल इतना ही को वो मेरे शहर का है, जिसे मैं १२ साल पहले छोड़ चुकी हूं, वो भी स्कूलिंग के तुरंत बाद। लेकिन कहते हैं न लड़कियों को मायके के शहर का भी कोई मिल जाए तो वो भाई हो जाता है। दीपू के साथ भी ऐसा ही हुआ, हमारा छोटा सा शहर श्री गंगानगर मैं तो खैर कब की छोड़ चुकी थी और जब वो राजस्थान पत्रिका में आया तो उसकी शहर के कुछेक लोगों में मैं भी थी। यूं हम दोनों कलिग से भाई बहन हो गए। खैर मुद्दे की बात ये कि उसके ब्लाग से आज भी मुझे अपने शहर की गंध आती है जो मुझसे तो कब की अजनबी हो चुकी है। दिल्ली, हैदराबाद और जयपुर आते-आते गंगानगर कब छूट गया पता ही नहीं चला। जिस शहर में आपका बचपन बीता हो वहां की यादें तो कभी नहीं जाती, यहां की नहीं जाती, शायद इसलिए यह नास्टेलिजया बार-बार परेशान करता है। इस बार पद्मश्री अवाड्सॆ के बहाने जो गंगानगर के एक शिक्शक को दिया गया है, उनकी ताउम्र गरीब छात्रों को पढ़ाने की ललक के लिए। दीपू ने एसएस माहेश्वरी पर काफी कुछ लिखा है जो मुझे अच्छा लगा, मैं तो खैर उन्हें ज्यादा जानती भी नहीं, एकाध बार उनका नाम जरूर सुना है, जब अवार्ड्स की घोषणा हुई तो उनके बारे में जानना चाहती थी, किस्मत से तभी दीपू गंगानगर में था और मुझे उसने काफी जानकारी दी।उसने अपने ब्ला‍ग पर भी काफी अच्छा पीस दिया है जो मुझे बहुत पसंद आया,

जिसका लिंक मैं चोरी से यहाँ दे रही हूँ, बिना उससे pooche

http://kahotokahun.blogspot.com/2009/01/blog-post_31.html